Wednesday, 4 November 2015

खिडकी

रोज  मुझ से बहार झाकते हो , कभी मुझ मे भी झाककर देख लो
क्यो, ?, नही पेहचान मुझे मे  कौन हु
मै तो वो छोटासा जरिया हु, नजरिया हु ,
मुझ से अगर झाको तो आसमान भी  मुठ्ठीभर लगता है
कोई मुझे झरोका कहता है, कोई खिडकी
आजकाल तो मुझे विंडो भी कहते है ,
जिस से पुरे दुनिया कि सैर  होती है

हमेशा मैने तुम्हारी आंखो से दुनिया देखी ही,
आज मै तुम्हे  मेरे अंदर कि दुनिया दिखती हु

की साल हो गये , सामने एक गुल मोहर का पेड था
और एक चिडिया आपण घोसला वाह पे बनाती थी
वाह घोसले मी एक नंही चिडिया थी
और यहा  घर मे भी
दोनो जगह वही चहल पहल
वही सारी खुशिया थी
एक दिन नंही चिडिया को  पंख  मिले और वो उड गयी
और घर भी कुछ खाली खाली हो गया, गुलमोहोर कि पेड कि तरह सुना सुना
आज भी  मुझ से दो आंखे झाकती है, थडी धुंदली सी याडो कि तरह
किसे के इंतजार मे , शायद अपनी नंही चिडिया के,
मै वही इंतजार हु

मै वो भी  इंतजार हु,
जब खिडकी मे से कोई अखियो  के झरोके से
झाकता था
और मन हि मन मन मे  मुस्कुरता था
प्यार के उस  बंधन कि  मै गवाह हु

मै तो वो भी गवाह हु
जिस ने एक एकेली जान को
अकलेपन कि इंतीहा देखी है
जीवन कि हर एक धूप छाव देखी है

-शीतल












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