Saturday, 24 September 2016

बारीशे

कई अरमान उतरे है आसमान से
धरती पर, बारिश कि बुंदे कि साथ
कई ख्वाब देखे अनदेखे से जैसे
उतरे आंखोसे सीधा रूह मे


गिलासा मन, भिगेसे पल कई
समेट लिये है दामन मे
डर लगता है कही
ख्वाब ख्वाब ना रह जाये
और अरमान भी बह जाये

बरसात के पानी मी
न छुट जाए ये लम्हे भी
दामन में जो थाम के रखे है

ना धुंदला जाये यादे इन पलों कि इतनी
कि मै भूल बैठु माँ का वो ममता का एहसास
डर लागता है कि कही खो ना जाऊ मैं भी
उस चांद कि तरह जो खोया है अंधेरे घने बादलो मे

पर फिर याद आती है वो मिट्टी कि खुशबू
जो मन महका देता है, और रूह जाग उठती है
फिर महसूस होती है माँ कि वो खुशबू
जहन में जो बस गयी है सालों से

और बताती रहती है कि
देखा कर ख्वाब बिना किसी खौफ के
नही बह जायेंगे अरमान, बरसात में

ना मेरा एहसास और ना तुम खो जायोगी कही
बरसने दो बारीशे कई, अरमान उनके साथ
मैंने खोली है मेरी बाहे उन्हें समेटने के लिए
-शीतल

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