Saturday, 4 February 2017

शायद ये प्यार फिर से हो जाये

हवा में कुछ खुशबु सी है
रात भी ये महकती हुई
समा है शायद मोहब्बत का
और बस हम तुम और
कुछ अनकही बातें
थोड़े गिले शिकवे
और कुछ मीठी से यादे
कुछ ख़ामोशी के पल भी है
ये कहते हुए की
अनजान बन जाओ
फिर इक बार
इश्क़ कही सिर्फ आदत ना बन जाये हमारी
क्या पता ये रात ढलते ढलते
शायद ये प्यार फिर से हो जाये
©शीतल

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