Saturday, 4 February 2017

पतझड़

इक लम्हा गिरा वक्त की शाख से
आखरी पत्ता था वो
सौ साल वाले पेड़ का जैसे
लोग कहते रहे हम से
मानने के लिए सच्चाई तुम्हारे ना होने की
पर नहीं जान सके वो
की आज भी महसूस होता है
तुम्हारा अस्तिस्व मुझ में ही कही
वो शब्द वो आवाज और वो स्पर्श
वो खुशबु आज भी है हवा में
जो मुझ तक पोहचती है
तुम्हारा संदेसा लेके, आशा और होसलो का
की पतझड़ के बाद ही तो बसंत बहार आती है
बस जीना सिख लो , मेरे बाद भी
लेकिन मेरे साथ भी
© शीतल

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