Tuesday, 24 January 2017

इश्क़

इश्क़ किया था, ना कुछ माँगा इसके बदले में
सिर्फ थोड़ी सी वफा की तो ख्वाइश थी
और तुम चाँद का वादा कर के
सिर्फ रात का अँधेरा देके चले गये
फिर भी मैं ढूंढ लेती हूँ रोशनी का इक सिरा
और चल पड़ती हूँ इक नयी सुबह की तलाश में
आखिर तुम ही तो बस वो नहीं जिसने दर्द दिया
और भी कई दर्द है सीने में, झुलसते हुए
और कोई न सही, मेरी जिंदगी ही मेरी हमसफ़र है
और बहोत मोहब्बत है मुझे उससे इस कदर की
मेरे ग़म भी हँसते हँसते सह लुंगी और बस जी लुंगी
©शीतल

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