Tuesday, 24 January 2017

खूबसूरत

वैसे तू बहोत खूबसूरत लगती है मुझे
सीदे सादे घर के लिबास में ही
पर जब हलका सा काजल
तेरी आखो की गहराई बढ़ाता है
बहोत ही कमाल लगती है तू
सुबह की भाग दौड़ में
पता भी नहीं की कभी
आईने से बात होती भी है तेरी या नहीं
पर बिना आईना देखे कभी कबार
तू छोटीसी बिंदी लगा लेती है
बस गज़ब लगाती है तू
और कभी कभी किस्मत होती है
चूडियों की भी की तेरे हाथ पे सजे
वो चूडियों की खनखनाहट
मुझे सात सुरो से कम नहीं लगाती
क्या कहु, और भी अच्छी लगनी लगती है फिर तू
इक दिन सपने में आई तू
सारे गहने पाके बड़ी हसीन दिख रही थी
पर बिंदी फीकी लग रही थी आज
चूड़िया भी तो खामोश और गुमसुम सी
और काजल भरी आँखे
पानी से डबडबायी हुई
ये सपना टुटे तो ही अच्छा है
सच कहु तो खूबसूरत लगाती है तू
कमाल और गज़ब भी लगती है
जैसी है वैसे ही सीदे सादे लिबास में
खुद की हस्ती संभालती हुईं
और जब पहनती है
मासूम सी हँसी
तेरे लबो पर
कमाल लगती है और गज़ब ढाती है तू
©शीतल

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